छठ पर्व : आस्था, संस्कृति और समरसता का लोकप्रकाश-प्रो देव प्रकाश मिश्र।
Editor : Shubham awasthi | 28 October, 2025
छठ की मूल भावना सूर्योपासना है — उस शक्ति के प्रति आभार, जो हर दिन हमें जीवन देती है। ऋग्वेद कहता है — “सूर्यो ज्योतिषां ज्योतिः” — यानी सूर्य सभी प्रकाशों का स्रोत है। छठ इसी प्राचीन परंपरा को जीवित रखता है। डूबते और उगते दोनों सूर्यों की पूजा यह सिखाती है कि जीवन में उजाला और अंधेरा, सुख और दुख — दोनों को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए।
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चार दिनों तक व्रती कठोर नियमों का पालन करते हैं — न कोई दिखावा, न वैभव। बस श्रद्धा, संयम और आत्मानुशासन। यह पर्व बताता है कि सच्ची भक्ति किसी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि भीतर की सच्चाई में होती है। इस साधना का केंद्र नारी होती है — जो परिवार की ही नहीं, समाज की आत्मा बन जाती है। जल में खड़ी वह नारी जब सूर्य को अर्घ्य देती है, तो वह जीवन, प्रकृति और सृष्टि के बीच संतुलन की साधना करती है। वह देवी नहीं, बल्कि ‘शक्ति’ बनकर समाज की प्रेरणा बनती है।
लेकिन छठ की महत्ता केवल धार्मिक नहीं है — यह लोकजीवन की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है। घाटों पर कोई जाति, धर्म या वर्ग का भेद नहीं होता। अमीर और गरीब, ऊँच-नीच, स्त्री-पुरुष — सब एक साथ खड़े होकर सूर्य को प्रणाम करते हैं। यही दृश्य भारतीय समाज की असली तस्वीर है, जहाँ आस्था के जरिए समानता का उत्सव मनाया जाता है।
छठ की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक एकता का भी जीवंत उदाहरण है। बिहार और पूर्वांचल के कई इलाकों में मुस्लिम समुदाय इस पर्व की तैयारियों में सक्रिय रूप से शामिल होता है। कई जगह मुस्लिम कारीगर बाँस की टोकरी, सूप और दौरा बनाते हैं, वहीं घाटों की सफाई, सजावट और व्यवस्थाओं में भी साथ देते हैं। कई घरों में मुस्लिम पड़ोसी “ठेकुआ” और “प्रसाद” के लिए मिट्टी का चूल्हा बनाते हैं। यह दृश्य बताता है कि छठ की भावना किसी एक धर्म की नहीं, बल्कि भारतीय समाज की साझी संस्कृति की है।
छठ पर्व हमें सिखाता है कि असली धर्म वही है जो समाज को जोड़ता है, बाँटता नहीं। यही कारण है कि यह पर्व राजनीति से भी परे जाकर लोकशक्ति का प्रतीक बन गया है। यह उस भारत की झलक है जहाँ लोक ही असली शक्ति है — जहाँ राजनीति का आधार भी संस्कृति है। घाटों पर जब हर व्यक्ति एक साथ खड़ा होकर सूर्य को अर्घ्य देता है, तो यह दृश्य भारत के लोकतांत्रिक आदर्श की सजीव व्याख्या बन जाता है।
यह पर्व पर्यावरण का संदेश भी देता है। सूर्य, जल और मिट्टी की उपासना हमें याद दिलाती है कि प्रकृति सिर्फ पूजनीय नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। आज जब नदियाँ सूख रही हैं, हवा दूषित हो रही है, तब छठ हमें बताता है कि प्रकृति की रक्षा ही सबसे बड़ी पूजा है।
आज जब आधुनिकता और वैश्वीकरण के दौर में लोकपरंपराएँ धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही हैं, तब छठ अपने पूरे तेज के साथ हमें यह याद दिलाता है कि हमारी असली ताकत हमारी जड़ों में है। यह पर्व केवल आस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, धार्मिक सद्भाव और सांस्कृतिक समरसता का उत्सव है। विदेशों में बसे भारतीय जब छठ मनाते हैं, तो यह भारतीय संस्कृति का वैश्विक संदेश बन जाता है — कि हमारी परंपराएँ सीमाओं से परे हैं, और उनमें सबके लिए जगह है।
सूर्य की आराधना के इस पर्व में केवल प्रार्थना नहीं, आत्ममंथन भी है। यह हमें सिखाता है कि जीवन का असली उजाला बाहरी दीपों में नहीं, बल्कि उस चेतना में है जो हमें प्रकृति, समाज और अपने साथी मानव से जोड़ती है। यही छठ का संदेश है — आस्था में अनुशासन, संस्कृति में समरसता और जीवन में समानता।
छठ पर्व इसलिए सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का उत्सव है — जो हर साल हमें यह याद दिलाता है कि भारत की असली शक्ति उसकी आस्था, उसकी नारी, और उसकी साझा संस्कृति में है, जहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनों के दीप एक ही सूर्य को नमन करते हैं।भारत की सामाजिक सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक अन्तःचेतना का प्रतिबिंब लोक जीवन इस पर्व में दृष्टिगोचर होते हैं।
छठ पर्व भारतीय संस्कृति का वो उज्ज्वल अध्याय है, जिसमें आस्था, अनुशासन और समाज की एकता एक साथ दिखाई देती है। यह केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन और प्रकृति के प्रति धन्यवाद का लोकपर्व है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश से निकलकर अब यह पर्व देश-विदेश के कोनों तक पहुँचा है, और भारतीयता की उस आत्मा को जगाता है जो सादगी में सुंदरता और तप में भव्यता खोजती है।