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पूजा पाल का अगला कदम यूपी की सियासत में नया मोड़?

Editor : Shubham awasthi | 24 August, 2025

उत्तर प्रदेश की राजनीति में हमेशा से ही अप्रत्याशित मोड़ और नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिलते हैं। 2025 का अगस्त महीना भी ऐसा ही एक दौर लेकर आया

पूजा पाल का अगला कदम यूपी की सियासत में नया मोड़?

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कौशांबी की चायल विधानसभा सीट की विधायक पूजा पाल के अगले राजनीतिक कदम को लेकर अटकलों का बाजार गर्म हो गया। प्रयागराज के धूमनगंज के सुलेम सराय इलाके में लगी एक नीले रंग की होर्डिंग ने न केवल स्थानीय लोगों को चौंकाया, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। इस होर्डिंग में दधिकांदो मेले का उल्लेख था, और नीले रंग के साथ-साथ इसमें संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की तस्वीर भी थी। नीला रंग, जो बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का प्रतीक है, ने यह अटकलें तेज कर दीं कि क्या पूजा पाल अपनी पुरानी पार्टी बसपा में वापसी करने जा रही हैं? या फिर यह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर उनका झुकाव है, जैसा कि पहले से चर्चा में था?

2005 में उनके पति, बसपा विधायक राजू पाल की प्रयागराज में दिनदहाड़े हत्या ने न केवल उनके जीवन को बदल दिया, बल्कि उन्हें राजनीति के मैदान में उतरने के लिए मजबूर किया। इस हत्याकांड में माफिया अतीक अहमद और उनके भाई अशरफ का नाम सामने आया था, जिसके बाद पूजा पाल ने अपने पति के हत्यारों को सजा दिलाने की लंबी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई लड़ी।


2005 में हुए उपचुनाव में बसपा सुप्रीमो मायावती ने पूजा पाल को प्रयागराज की शहर पश्चिमी सीट से टिकट दिया। पूजा ने न केवल यह चुनाव जीता, बल्कि 2007 और 2012 में भी बसपा के टिकट पर इस सीट से जीत हासिल की। हालांकि, 2017 में बीजेपी की लहर में वे हार गईं और बाद में एक विवादित वीडियो के कारण बसपा से निष्कासित कर दी गईं। इसके बाद 2019 में उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थामा और 2022 में कौशांबी की चायल सीट से सपा के टिकट पर विधायक बनीं।

लेकिन पूजा पाल का सपा के साथ सफर ज्यादा लंबा नहीं चला। 2024 के राज्यसभा चुनाव में उनकी क्रॉस वोटिंग और बीजेपी प्रत्याशी के समर्थन ने सपा नेतृत्व को नाराज कर दिया। इसके बाद 2025 के विधानसभा सत्र में पूजा पाल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की खुलकर तारीफ की, खासकर उनके पति राजू पाल के हत्यारों को सजा दिलाने और अतीक अहमद के खिलाफ कार्रवाई के लिए। उन्होंने कहा, "मुख्यमंत्री ने प्रयागराज में मुझ जैसी कई महिलाओं को न्याय दिलाया और अपराधियों को दंड दिया।" इस बयान को सपा ने पार्टी विरोधी गतिविधि माना और अखिलेश यादव ने उन्हें तत्काल प्रभाव से पार्टी से निष्कासित कर दिया।

पूजा पाल के सपा से निष्कासन के बाद उनके बीजेपी में शामिल होने की चर्चाएँ जोरों पर थीं। उनकी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य से मुलाकातें, साथ ही फूलपुर उपचुनाव में बीजेपी प्रत्याशी दीपक पटेल के लिए प्रचार, इन अटकलों को और हवा दे रही थीं। लेकिन तभी प्रयागराज के धूमनगंज में लगी नीले रंग की होर्डिंग ने सबको चौंका दिया। इस होर्डिंग का रंग और इसमें बाबा साहेब अंबेडकर की तस्वीर ने बसपा में उनकी वापसी की संभावनाओं को जन्म दिया।


पूजा पाल का बसपा के साथ पुराना नाता रहा है। 2007 से 2012 तक वे बसपा की विधायक रहीं और मायावती के नेतृत्व में अपनी पहचान बनाई थी। नीली होर्डिंग को देखकर राजनीतिक विश्लेषकों ने अनुमान लगाया कि शायद पूजा पाल अपनी पुरानी जड़ों की ओर लौटना चाहती हैं। यह होर्डिंग दधिकांदो मेले के लिए थी, लेकिन इसका रंग और प्रतीकात्मकता ने सियासी हलचल पैदा कर दी। कुछ का मानना है कि यह बसपा की ओर उनका झुकाव दिखाता है, जबकि अन्य इसे एक सोची-समझी रणनीति मानते हैं, जिसके जरिए पूजा पाल अपनी सियासी प्रासंगिकता बनाए रखना चाहती हैं।

दूसरी ओर, बीजेपी में पूजा पाल की संभावित एंट्री को लेकर भी चर्चाएँ कम नहीं हैं। सूत्रों के अनुसार, बीजेपी उन्हें एक फायरब्रांड महिला नेता के रूप में प्रोजेक्ट कर सकती है, जो सपा के 'पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक' (PDA) फॉर्मूले को चुनौती दे सके। पूजा पाल अति पिछड़े वर्ग से आती हैं, और उनका पाल-बघेल समाज में मजबूत प्रभाव है, खासकर प्रयागराज और कौशांबी जैसे क्षेत्रों में।

2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के PDA फॉर्मूले ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी। बीजेपी अब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में है और पूजा पाल जैसे नेताओं को अपने पाले में लाकर सपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति बना रही है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पूजा पाल को योगी सरकार में मंत्री बनाया जा सकता है, जिससे उनकी छवि और मजबूत होगी।

पूजा पाल ने खुद भी बीजेपी के प्रति अपनी सहानुभूति छिपाई नहीं है। एक बयान में उन्होंने कहा, "मेरी और बीजेपी की वर्तमान विचारधारा मिलती-जुलती है। मैं जिस पीड़ा से गुजर रही हूँ, वे उस पर अंकुश लगाने की ओर काम कर रहे हैं।" यह बयान उनकी बीजेपी के प्रति नजदीकी को और स्पष्ट करता है।

2027 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की सियासत का एक महत्वपूर्ण पड़ाव होगा। बीजेपी, सपा, और बसपा, तीनों ही दल अपनी-अपनी रणनीतियों को मजबूत करने में जुटे हैं। पूजा पाल इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं। अगर वे बीजेपी में शामिल होती हैं, तो उनकी छवि एक ऐसी नेता की होगी, जो माफिया के खिलाफ लड़ाई और महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है। बीजेपी उन्हें सपा के PDA फॉर्मूले के खिलाफ एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकती है।

वहीं, अगर पूजा पाल बसपा में लौटती हैं, तो यह मायावती के लिए एक बड़ा मौका होगा। बसपा को एक बार फिर दलित और पिछड़े वर्ग के बीच अपनी पैठ बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। पूजा पाल की सहानुभूति और उनके पति राजू पाल की हत्या से जुड़ा भावनात्मक पहलू बसपा के लिए फायदेमंद हो सकता है।